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इंतेज़ार

दिन भर उस चबूतरे पे बैंठ, हाथों से पान में उन डलियों को ऐंठ, देर तक उस गलियारे को देख, इंतेज़ार किसी अपने का ही वो करती थी। पुराने सलवार और कमीज को सिल, बच्चों की शर्तों में कहीं जोड़, कहीं चक्ति। बस एक वो पानदान, और वो सिलाई मशीन, जाने कितने ही साल इंतेज़ार वो करती रही। कभी आता था वो, कभी नही भी, पर इंतेज़ार होता पूरा नही। कभी थोड़ा बैठ बातें करते थे शायद, पर इंतेज़ार होता पूरा नही। इंतेज़ार शायद उस शक्स का नही, उसके जज़्बातों का था उसको। कुछ लफ्ज़ सुनने का, कुछ गीत सुनाने का था उसको। बहुत पहले ही ब्याह के आयी थी, न ज़्यादा थे ख्वाब, न ज़्यादा उम्मीद। बस एक ख्वाब, बस एक वही, दो लफ्ज़ प्यार, एक प्रेम गीत। अक्सर श्रृंगार कर उसको रिझाती, रंग गुलाबी गालों पे लगाती, पर न सुन पाती वो लफ्ज़ उससे, न वो गीत सुना पाती। हर बार, हर बात उसके गालों पे रुक जाती थी। हर बार, हर बात उनपे पटाखों सी बज जाती थी। अक्सर उसका रूह बन जाने का मन करता, पर फिर अगले रोज़, वो इंतेज़ार में बैठ जाती थी। 

पुनर्जन्म-1

पहला ही पग रख जो देखा एक माता ने, ना सह सकता है कोई जहाँ; मौन थे देव सारे, और धड अलग पडा था पुत्र का। घुटनो पे बैठ उस माता ने चिल्लाया, धड उठा अपनी गोध मेँ समाया; अश्रु बह उन गालो से उतरे, निरजीव बालक की क्षाति को भिगाया। सीने से लगा कर रोयीं वो कुक्ष देर, दुखी थे सारे देवगढ, और देव; सर छुकाये थे खडे त्रिशूल-धारी भी, इस त्रिशूल से ही भूल कर बैठे थे वे। "किस्का है ये पाप यहाँ, एक बालक पर करा पृहार किसने? पुत्र मेरा है मृत पडा, ये पाप घोर किया किस्ने?" प्रचंड स्वरूप में आई वो देवी, आक्रोष से थी आँखे लाल; था क्रोध उनके उस सुंदर मुख पे, था हाथों मे उस बालक का गुलाल। थर थर कापी धरती उस दिन, गगन भी भय से लगा कापने; विराठ रूप देख उस देवी का, आग्रह सारे देव लगे करने। "आज कर दूंगी नाश इस सृष्टि का, आज सूख जायेंगी नदियां और पेड; आज कर दूंगी विनाश इन जीवो का, कर इस आकाश को भेद।" धरती पर लाल त्रिशूल रख, हाथ जोड़ आऐ नीलकंठ समक्ष; अश्रु उनके भी थे लगे बहने, "आपका पापी है खड़ा प्रत्यक्ष। इस बालक का हठ था कारण, अड़ गया था द्वार पर; सम...

खून

इन    खून  में    साने  हाथो    का    कपकपाना    सुन , एक  सकपकाए    दिल    ने    आवाज़    लगाई    फिर से , ‘ क्या    साँस    बाकी    है    अभी ? या    एहसास  हुआ    कोई    ग़लत  फिर    से ?’ आँखों    से  पानी    रिस्ता  देख  लगा , थोड़ी  जान  बाकी  अभी  थी    शायद  उसमे ; अपने    खूनी  की    तरफ  देख , हाथ  उठा  गुहार  लगाई  फिर  उसने | ना    थी  अब  कोई    भावना , ना    प्यार ,   ना  संतवाना ; फिर  भी    उसके    दर्द  से  कराने  आज़ाद , घोत  कर  गला    पड़ा    दबाना | ...

आज़ादी

आज से अच्छा तो वो बचपन ही था, जब झींझक से आज़ाद थे| कोई रोक ना कोई टोक थी बोलने पे, कुछ भी पहेन्ने को आज़ाद थे| आज जो एक ख़ौफ्फ सा लगता है, अपने दिल का करने में| इस ख़ौफ्फ से भरी ज़िंदगी से, तब तो पूरा आज़ाद थे| धर्म का कोई बंधन ना था, ना था कोई डर भगवान से| आज जो ख़ौफ्फ है पुजारियो से, उस ख़ौफ्फ से बिल्कुल आज़ाद थे| वो दोस्त जिसके डब्बे से खाते थे, वो दोस्त जिसको दिन भर चिढ़ते थे, आज जिसको धर्म पे बाटते हैं, तब उसका पूरा नाम भी नही जानते थे| ये बटवारा काइया किसने है? ये दर्रार डाली किसने है? पर आज जो दर्रार भरने को डरते हैं, उस डर से तब सब आज़ाद थे| मन का कहने से डर ना लगता था, ना था डर खुल क सोचने में| आज जिस सोच में भी झींझक है, उस झींझक से पूरा आज़ाद थे| उस सोचने से ही आता था समझ, सही-ग़लत क बीच का भेद| आज जो भेद भी धुंधला सा लगता है, उस उलझन से तब आज़ाद थे| इस झींझक, इस ख़ौफ़, इस घुटन से, चाहिए आज तो आज़ादी हमें| ना लौटा सको वो बचपन तो, वो आज़ादी ही लौटा दो हमें|

बचपन

आज भी पापा की थैली में, कुछ खाने का पा जाते हैं, आज भी उनके जगाने के झूठ में, अक्सर फस जाते हैं| आज भी कुछ गरजने की आवाज़ सुन, आँखें आसमान को देखती हैं, आज भी ये आँखें कोई, हवाइज़हाज़ या हेलिकॉप्टर ढूंडती हैं| आज भी सुबह उठने में, उतनी ही परेशानी होती है, आज भी आधी नींद में, पूरी किताबें पलटती हैं| आज भी मुसीबत में फोन, सबसे पहले दादा को ही जाता है, और फिर उसके फोने के साथ, पूरा समाधान भी आता है| आज भी गाने, वो पुराने ही अच्छे लगते हैं, कभी रफ़ी, कभी किशोर, तो कभी मुकेश भी सुन लेते हैं| पर आज क्यू अकेले, अंधेरे में रहते हैं, दूसरो को सिर्फ़, हसते हुए रहते हैं? आज क्यू आँसू सिर्फ़ आँख तक ही रह जाते हैं? क्या अभी बचपन, सिर्फ़ भुलाने को कहते हैं?

काग़ज़ के जहाज़

काश उन पंखों में हवा होती, तो कहीं दूर चल देते हम; थोड़ी देर ठहरते, फिर उससे भी दूर उड़ जाते हम| उड़ने से थके पंखों को बालों में घिसते, फिर नाखूनो से मोदते उन्हे हम; नोक को सीधा कर के, फिर हवा में चल देते हम| जोड़ों को दबा कर, उनमें फूँक भी भर देते हम; एक आँख से निशाना लगा के, फिर से उड़ चलते हम| कहीं समुंदर देखते, तो कहीं पहाड़ भी देखते हम; कहीं झरने देखते, तो कहीं इमारतें भी देखते हम| पर ये जहाज़ कभी उड़े ही नहीं, कभी ये दूर तक गये ही नहीं| कुछ थे बने अख़बारों से, तो कुछ फटे पन्नो से| कुछ थे बने लड़ाई में, तो कुछ बस युहीन खेल में| पर उन सबकी उड़ान छोटी ही थी, छत से सूखे आँगन तक|

लहरें

मैं किनारे पे खड़ा उस कश्ती को देखता हूँ, उसपे सवार उन मछुआरों को देखता हूँ, डूबते हुए सूरज की कमज़ोर किर्णो में, उस कश्ती की शांत परछाईं को देखता हूँ|  पूरा सागर शांत है, लहरें उसकी खामोश हैं, किनारे पे मेरे कदम भिगाती, ये लहरें अभी भी बेज़ुबान हैं| ये वही लहरें हैं जिनसे मैं डरता हूँ, दिन में, इनके रूप से डरता हूँ, बारिश में, इनके गुस्से से डरता हूँ, शांत महासागर, में इनके उछाल से डरता हूँ|  अभी ये खामोश हैं, पर ये खामोशी भी मुझे डराती है, पता नही क्या छुपाति ये हैं, मेरे ज़हन को हल्के से हिला जाती हैं|  कितनी ही कश्टियाँ डूबा चुकी हैं ये, कितनी ही ज़िंदगियाँ उजाड़ चुकी हैं ये, पता नही है कितनी भूख इन्हे, की अभी भी उस कश्ती पर मु फैला रही हैं ये|  कुछ तो होगी वजह, जो हैं इतनी तुनकी ये, जो भूख इनकी इतनी असीमित है, जो ताक़त इनकी इतनी अतुलनीय है|  पर उससे भी ज़्यादा है ताक़त उनकी, जो है जाते लड़ने इनसे, और है ज़्यादा हिम्मत उनकी, जो हैं जाते खेलने इनसे|  होती उनकी है जीत कभी वहाँ, तो कभी वहाँ हार भी जाते हैं वो, जिस डर ...

आज इतनी धूप क्यू है?

आज इतनी धूप क्यू है, हवा के साथ,ये धूल क्यू है, मुझे तो चलना सीधे हैं, मेरे खिलाफ इसका रुख क्यू है? यू ही चलते हुए इस धूप में, बिना टोपी और शूज़ मैं, मेरे साथ या मेरे खिलाफ ये लू है, आज इतनी धूप क्यू है? यू ही चलते हुए हवाओं में, क्या नज़र आया इन बंद आंखो से, मेरी ही तरह एक मुसाफिर, पर वो इतना खुश क्यू है? कपड़े हैं पुराने से, धूल में सने हुए, पर उसके चेहरे से कुछ और ही लगता है, धूल से गंदा,पर वो हंसी क्यू है? शायद कुछ पा लिया है उसने, शायद कुछ खास हो वो, या वो लौट के आ रहा है,पाके अपनी मंज़िल को, इसीलिये शायद इतना खुश वो है! उसको देखते हुए आगे निकल गया मैं, और वो मुस्कुराते हुए, हाथ हिलाते हुए, पीछे निकल गया क्यू है? कहाँ से आया था वो, कहाँ था जाना उसको, कभी नहीं जान पौन्गा, क़ी वो इतना खुश क्यू था! पर मैं चलता रहा युही, मुझे तो चलना सीधे था, हवा के साथ,ये धूल क्यू है, आज इतनी धूप क्यू है??